Wednesday, 14 August 2013

बेटे आजाद हुए, माँ गुलाम रह गयी..............................



बंगाल  में बिताए  पिछले  दो  महीनों के  अंत  में  मैं  जरा घूमने  को  निकला  था,  और  काफी  दूर दूर घूमने  के  बाद  लाल बाजार के  चर्च  में  पहुंचा, जहाँ  ईश्वर  का  सन्देश  सुनाया  जा  रहा  था,  फिर  प्रार्थना  हुई  जो  कि  पियानो  पर  दिए  गये  पार्श्व-संगीत  के  साथ  गाई जा रही  थी |  करीब  सौ  लोगों  ने  एक  साथ  जैसे  ही गाना  शुरू किया  मुझे  उस  बड़े  से  हॉल  के  अन्दर  कुछ  अजीब  सा  महसूस  हुआ  जो  मैं  बयां   नहीं  कर  सकता |

आज  याद  आया   एक  बार  और  भी  वैसा  महसूस  हुआ,  जब  काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय  में  कृष्ण जन्माष्टमी  का कार्यक्रम  था  और   करीब  दो सौ लोगों  ने  एक  साथ  कुछ  गीत  या  आरती  वगैरह  गए  थे,  मैं  उस  दिन  भी उपर  की मंजिल  से  निहारता  हुआ  कुछ पल को  ठहर  गया  था |

एक  बार  और  भी  ऐसा  हुआ  जब  मेरे  एक  सहपाठी  ने  रमजान  के  महीने  में  मुझे  एक  नोहा  सुनाया.  और  मुझे  एक  अलग  एहसास  का  दीदार  हुआ.

लेकिन  कभी  मेरी  जिन्दगी  में  ये  लम्हे  रोज  आया  करते  थे   जब  हमारे  छोटे  से  स्कूल  में  छुट्टी  के  समय  वन्दे  मातरम्  और   जन-गण-मन   का  सामूहिक  सस्वर  गायन  होता  था |  मुझे  याद  है  कई  बार  गाते  गाते  मैं  अपनी  आँखें  बंद  कर  लेता  था   और  महसूस  करता  था  मानो  उस  लम्बे  चौड़े  खेल  के  मैदान  में  मैं  अकेला  खड़ा  हूँ |

पर  अगर  कभी  मैंने  इस  अनुभव  को  सबसे  गहराई  से  जिया  है  तो  वह  कुछ  लम्हों  के  लिए  नहीं,  अपितु  पूरे  दिन  भर  के  लिए |  और  यह  मौका 
15 अगस्त  के  दिन  ही  आता  था  जब  सुबह  कंधे  पर  स्कूल  का  बस्ता  होने  की  बजाय  हाथ  में  एक  छोटा  सा  तिरंगा  हुआ  करता  था,  और  रिक्शे  से  जाने  की  बजाय  पैदल  सारे  स्कूलों को  देखते  हुए  जाना   पसंद  आता  था  |

सुबह  सात  बजे  ही  स्कूल  पहुचना  और  तमाम  सारे  कार्यक्रमों  की  ऐसे  जानकारी  लेना  जैसे  कि  प्रधानमंत्री  के  सचिव   क्या  लाल किले  का  बंदोबस्त  देखते  होंगे,  यह  भी  अपना  प्रिय  शगल  था |  और  फिर  वे  क्षण  जिनका  उल्लेख  शुरुआत  में  ही  किया  था,  उनमे  लाल सफ़ेद  हरे  रंग  का  घुलना  और  मिला  दीजिये,  उसके  बाद  के  एक  डेढ़  मिनट  तक  जो  कुछ  होता  था  वह  शायद  जीवन  भर  याद  रहने  वाला  अनुभव  है |

यूँ  कुछ  और  खास  सांस्कृतिक  करतबों  के  साथ  हमारा  दिन  बीत  जाया  करता  था,  और  उस  दिन  की  शाम  का  आना  सबसे  ख़राब  लगता  था  क्योंकि  दो  कंधे  ये  एहसास  कर  लिया  करते  थे  कि   अब  यह  साल   भर  बाद  ही  आएगा,  एक  हथेली  अपने  हाथ  में  साल  भर  अब  बर्फ  के  गोले  की  डंडी  ही  पकड़ेगी,  उस  छोटे  तिरंगे  को  थामे  रखना  साल  भर  बाद  ही  हो  सकेगा |

मैंने  कई  बार
15अगस्त की  रात  में  जागते  हुए  भी  ये  सोचा  कि  क्या  ये  तीन रंग  जो  मेरा  पसंदीदा  समायोजन  हैं,  क्या  मैं  इन्हें  साल  भर  नहीं  देख  सकता  ,  साल  भर  अपने   पास  कुछ  खास  रूपों  में  नहीं  रख  सकता,  उस  समय  बड़ी  दीदी  ने  कुछ  कानून  और  कायदे  टाइप  समझाये  जो  कुछ  खास  समझ में  तो  नहीं  आये  किन्तु  कुछ  ही  समय  बाद  ये  खबर  जरूर  मिली  कि  अब  ये  तीन  रंग  आप  कभी  भी  उपयोग  में  ला  सकते  हैं,  तिरंगा  कभी  भी  लगा  सकते  हैं |  वह  दिन  भी  मेरे  लिए  बड़े  सुकून  का  था  और  कुछ  सालों  बाद  जब  मैं  इतना  स्वतंत्र  हुआ  कि  कुछ  कपड़े  खुद  से  खरीद  सकूं  तो  एक  दो  कमीजों  में  जेब  के  ठीक  ऊपर  तीन  रंगों  की  धारियां  फेर  दीं |  वो  बात  और  है  कि  यह  प्रायः  बेवजह  लोगों  के  ध्यानाकर्षण  का  कारण  बन  जाया  करता था/है |

आज  यह  सब  क्यों  लिखा > ??
पिछले  कई  सालों  से  इस  एक  दिन  या  अन्य  राष्ट्रीय  दिवसों  की  प्रासंगिकता  पर  लोगों  से  टीका-टिप्पणियां  सुनता  आया  हूँ |  इस  साल  भी  होंगे,  शर्तिया  फेसबुक,  अखबार, विविध  भारती,  एफएम  इत्यादि  इत्यादि  पर  तमाम  जगह  तमाम  लोग  अपने  अपने  ढंग  से  इस  पर  चर्चा  करेंगे  कि  आज  के  दिन  इतना  उल्लास  क्यों?  यथा,  भारत  पूरी  तरह  आजाद  नहीं  है,  हमारे  घर  में  ना  सही  हमारे  नौकर  के  घर  में , बहुत गरीबी  है,  हमारा  समाज  छोटी  सोच  का  है,  हमे  सुविधा  नहीं  है,  हमे  समर्थन  नहीं  है,  हमारा  जिला  अलग  नही  है  हमारा  राज्य  अलग  नहीं  है,  हमे  आरक्षण  नहीं  है,  बिहार  में  नौकरी  नहीं  मिल  रही,  मुंबई  में  बिहारी  नहीं  रह रहे, जम्मू  से  पंडित  निकले  गये, दिल्ली  में  पानी  नहीं,  यूपी  में  ईमानदारी नहीं, हमारे  ऊपर  पाकिस्तान  का  हमला  है,  चीन  का  अजगर  है,  फलाना ढिकाना |  
ये  सारे  कारण  हैं  जिन्हें  सुनने  या  पढने  के  बाद  तमाम  लोग  राय  देते  हैं  इसके  समर्थन  में  कि  वाकई  आज  के  दिन  यह  सब  आयोजन  आजादी  के  बाद  की  तमाम  भूलों  में  से  एक   है  या  कम  से  कम ध्वजारोहण के  बूंदी  के  लड्डू  खा  लेने  के बाद  तो  स्वतन्त्रता दिवस  कतई  ही नहीं  मनाते  हैं |  हालाकि  मैंने  ऐसे  लोगों  को  दिवाली,  ईद,  प्रकाश पर्व, क्रिसमस  और  सेकुलर आयोजन  नए साल (सॉरी नव संवत्सर भी  है)  पर  ऐसा  रुख  या  तेवर अपनाते  नहीं  देखा,  वे  होली  को रंग  फेंकते  हैं,  मुहर्रम मनाते  हैं , कैंडिल  जलाते  हैं ........
तब  एक  देश  के  एक  छोटे  से  उल्लास  भरे  आयोजन  पर  ही  सारी  तर्क  और  तूरीण  क्यों ?  क्या  यह 
15 अगस्त  और  26
जनवरी  नाम  के  दो  दिनों  के  खाते  में  ही  लिखा  गया  है ?  इतना  दुर्भाग्यशाली  शायद  ही  कोई  देश  होगा  जहाँ  हम  अपने  सार्वभौमिक  से  त्योहारों  पर  आलोचना  के  तरकश  से  तीर  बरसाते  हैं,  और  अपने  निरोध  जैसे  धर्म, जाति  और  समाज  के  त्योहारों  पर  सारे  उल्लास  और  उत्सवधर्मिता की  सारी  पराकाष्ठाएं  दिखला  देते  हैं |  इस  अजीब  से  वैचारिक  मतभेद  का  भेद  क्या  है,  मुझे  पता  नहीं,  किन्तु  मैं  इतना  जरूर  कहूँगा  कि  मैं  स्वयम  इस  दिन  को  कभी  भुला  नहीं  सकता |  यह  मेरे  बचपन  से  अब  तक  का  शायद  सबसे  प्रतीक्षित  रहने  वाला  दिन  रहा  है | और  रहेगा  भी |
माफ़  कीजिये  ये  दुर्भाग्य  भी  है  कि  कुकर्मी  अधिनायकों  ने,  और  हम  आप सबने   इन  दिनों  पर  छुट्टी  घोषित  करके  कर्मठता  के  सबसे  एकीकृत  स्वरुप  के  प्रतीक  दिवस  को  अकर्मण्यता  दिवस  बना  दिया  है |


   
कुछ  घंटों  बाद  ही  वह  जो  कुछ  उत्सव  जैसा  है  जिसे  मनाने  का  मैं  हमेशा  इन्तजार  करता  था,  आने  वाला  है  |  पिछले   कुछ  सालों  से  ये  क्रम  टूट  चुका  है |  अब  सुबह  देर  से  उठता  हूँ  इस  दिन  भी  सात  आठ  तो  बज  ही  जाते  हैं,  फिर  हॉस्टल  के  गेट  पर  पहुचता  हूँ  साढे  दस  के  करीब  या  कभी  कभी  एम्फीथियेटर  भी  चला  जाता  हूँ  कुलपति  का  कार्यक्रम  इत्यादि  देखने  |  शाम  चार  बजे  तक  की  उपलब्धि  केवल  कुछ  दो  चार  लड्डू  या  मिठाई  रहती  है  बस  शाम का  ही  इन्तजार  रहता  है |  जब  अपनी  एक  दो  बांसुरी  और  वह  डायरी  जिसमे  कुछ  देशभक्ति  के  अपने  गीत मैंने  लिख  रखे  हैं ,  उठा  कर  घाट  की तरफ  चल  देता  हूँ |

Saturday, 7 July 2012

बहाने के बहाने.............

पिछले कुछ दिनों या वर्षों में संस्कृति के एक नए अध्याय से रूबरू हुआ हूँ|

ये कुछ नई सी परम्परा है युवाओं के किंकर्तव्यविमूढ़ झुण्ड की|

सिगरेट, दारू (कई प्रकार-वाइन, व्हिस्की, वोदका, टकीला, नीली परी, बैगपाइपर से लेकर ‘सेकुलर बीयर तक) और कुछ उच्च स्तरीय नशे हमारे सामाजिक स्तर के पर्याय से बन गए हैं|

एक कार्यक्रम के तहत आमिर खान इस बाबत प्रयासों में जुटे हैं, किन्तु मैं इस मुद्दे पर कुछ मनोवैज्ञानिक पक्ष बताता हूँ|

पहला पक्ष सर्वसंवैधानिक सा लगता है|
“यार आज एक्जाम खत्म चलो हो जाए”
“यार इतनी दूर घूमने आये हैं साला एक पैग तो बनता है”
“यार इतनी बड़ी सिटी है कौन देखेगा, फिर यहाँ तो कल्चर भी वही है, चल एक सुट्टे के साथ हो जाए”

ये सब बड़े ही वाजिब कारण हैं नशे के| और यदि आप युवा हैं और इन अमृततुल्य पदार्थो का सेवन नही करते तो इन मौकों पर आप दूध की मक्खी की तरह या तो कम्युनिटी से बाहर हो जाते हैं या बच्चे समझ लिए जाते हैं|

छात्रावास से लेकर किसी पब तक हमारी प्यास बुझ सकती है|

हांलाकि युवा (पुरुष) नशे के इन उपकरणों को अपने पौरुष और शक्ति का एकमात्र पैमाना समझते हैं, ये उनकी स्मार्टनेस को प्रदर्शित करता है और शायद हर महीने नई कली तक भौंरे को पहुचाने का मधुमास भी है यह| उनकी पूरी खूबसूरत दिखने की चाह केवल पब में दो जान पहचान की लड़कियां पाने भर की होती है जिनके साथ वे रंगीनियत की कृत्रिमता बरक़रार रख सकें| सिगरेट पीना एक स्टेट्स सिम्बल हो गया है, और कमरे में पीना तो दब्बुओं की निशानी है बेहतर है कि सरेआम चौराहे पर, यार सड़क पर चलते हुए, किसी से बात करते हुए पी जाए|

युवा पुरुषों के लिए तो जीवन की कोई भी असफलता का एकमात्र सहारा पौये के आँचल की छांह है|

यहाँ काबिल-ए-गौर यह है कि जो लोग तमाम सारे सार्वजनिक नियमों की अनदेखी की बात करते है, वे भी नशे के लिए अपनी आत्मा गिरवी रख सार्वजनिकता की भ्रूण-हत्या कर देते हैं|

मुझे बदहजमी तब होने लगती है जब हमारे दायरे और मित्रता भी नशे पर आधारित हो|
हमारे दो तीन साथी ऐसे हैं जिनकी कुछ खास लोगो से मित्रता का एकमात्र आशय, साथ साथ सिगरेट के कोठे तक जाने भर का है|

लड़कों की हर पार्टी इसके बिना अधूरी है, और मोहब्बत होने से लेकर खत्म होने तक का हर जलसा भी| जब तक कुछ पिया ना जाए, पिया की याद आना बंद ही नही होती|

अगर इतनी बाते लडको या युवा(पुरुष) पर कही गयी हैं, तो अब लड़कियों(युवतियों) की चर्चा भी प्रासंगिक है|

सुंदरता के साथ शील होना १९वी सदी का पैमाना रहा होगा|

यदि आपने प्राचीन हिंदू साहित्य पढ़ा हो तो मालूम होगा, जहाँ सौंदर्य के प्रवाह में कामुकता को भी स्थान मिला है| अब देखिये, समय स्वयम को दोहराता है|

आज यही कामुकता सेक्सुअलिटी बनकर आई है और युवतियों के लिए प्रतिस्पर्धा का अबूझ पैमाना बना बैठी है| यदि कभी दारू ना पी जाए, कश ना लगाया जाए तो आखिर कोई हमे घास कैसे डालेगा, ऐसे विचारणीय प्रश्नों का प्रजनन आज नितांत ही सामान्य है|

सेक्सुअलिटी, स्वतंत्रता, युवाओं(पुरुष) के साथ बराबरी, और आधुनिकता(मोडर्निटी) ये चार ऐसे अचूक बहाने हैं जिन्होने युवा(स्त्री) वर्ग को नशे का आलिंगन करने का पथ सुझा दिया है|

खैर युवा वर्ग और नशे पर ये सब कहने के पीछे की बात ये, कि आमिर खान की मुहिम का मैं समर्थन करता हूँ (हालाँकि वे खुद अपनी आदत से मजबूर हैं)|

और एक गुजारिश अपने साथियों से, कि पीना आपकी लाचारी, मजबूरी, बेकारी, बेकरारी हो सकती है किन्तु उसे घटिया सामाजिक चोला मत पहनाइए|

हो सकता है लैंगिक प्रतिस्पर्धा से लेकर मस्तिष्क ज्वर तक के लिए नशा ही आपके लिए पहला और आखिरी उपाय हो गया हो किन्तु उसे सांस्कृतिक गालियाँ देकर सही सिद्ध मत कीजिये|

सत्यमेव जयते

Saturday, 16 June 2012

घर पर रहकर राग-रागिनियों के फेर में उलझा हूँ,
राग भैरव को खुद से थोडा बहुत समझने के बाद एक रचना को उसमे निबद्ध किया,

रचना क्या साब हमारे यहाँ की भाषा में एक गीत है,
ऐसे गीत पहले भी कई बार लिखे गए, किन्तु इस बार ये थोडा सा अलग है,
ये गीत एक माँ-बेटी का संवाद है....
अन्तःवस्तु बिछोह का रस देती है.....

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बेटी-------------------------
अम्मा मेरी, काहे ना मों पै नेह,
जैसी कछु बिटिया तिहारी,
मेरो सावन बीत गयो परदेस,
ऐसी कौन गलती हमारी|

बचपन से तुम एक आस हमारी,
कौनहू विपद पडी हो भारी,
जबै ननिहाल गयी तुम दोय दिन,
रोवत कटि गयी रात हमारी,

भूलो मोहि अब लौं तुम्हारो ना गेह,
जैसी कछु बिटिया तिहारी,
मेरो सावन..............................

मोहि सुहावनो लागै सजन एक,
तुमसे विलग हों चाहूँ ना छिन एक,
बाबा को क्रोध अनल सो बरसो,
त्यागो मोहे कठोर ए प्रन एक,

बाबा मेरे तुम बिन सुनो सो देस,
जैसी कछु बिटिया तुम्हारी,
मेरो सावन.............................

बीती जो होली बिना घर आवे,
पिछली दिवाली की याद दिलावे,
भैया है छोटो, पठेहो ना तुम बाबा,
राखी बंधू कैसे, जिय घबराबे,

अब मैं जियन की आस करूँ कैसे,
तोडो जो नाता ओ कौन बँधावे
जब मेरी आस दिखें टूक बिखरे,
अँखियन असुवन की धार लगावे,

मैया मेरी, साँसन को पढ़ियो संदेस,
जैसी कछु बिटिया तिहारी.......

मेरो सावन............................
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माँ,------------------------
मोहे सुहाग ने सौं दै दीनी,
बाबा ने तोसे तोरी मैया छीनी,
याद हमे हू हैं बातें, तिहारी ,
जैसी कछु तुम अंस हमारी,

जानो मेरी, मजबूरी को बेस, नाही कछु गलती तिहारी,
तेरो सावन...................

Friday, 30 March 2012


आसां नही कि तुम्हे सब कुछ कह सकूँ,
कुछ अनकहा धडकन भी समझा देगी,
जब जवाब ना मिले दिल से भी कोई,
मेरी यादों में खो जाना हर प्यास बुझा देगी,

जो नींद अब तक ना आई हो,
करवटें बदलना छोड़ दो,
किसी एक करवट पर ही मेरा ख्याल करो,
खुशनुमा हो माहौल कैद साँसों को खोल दो....

टूटना जुडना रूठना मनाना ,
अब रोज के किस्से हैं ख्याल ना करो,
छोटे तालाब यहाँ वहाँ हैं छोडो उन्हें,
इस सागर में आ मिलो,

जिन लम्हों को सजा कर जीने का खाब था,
उन्हें ऐसे सुपुर्द-ए-ख़ाक कर ना जाओ,
मैं वहीँ हूँ जहाँ तुमने (साथ नही) हाथ छोड़ा था,
हे ! प्रेयसि, चली आओ...................................

Monday, 30 January 2012

फूटी चौराहे की बत्ती
रौशन नहीं है रात
क्या करें उल्लू से बात----
ये संस्कृति उल्लू की पट्ठी
बतला रही कोयल और कौवों के बीच
बंटी धार
देह व्यापार
छंद पुराने कवियों के
कांपते अंग भय से
निकृष्ट कायिक अनुगूंज का
प्रलापालाप
लज्जा है!

लज्जित , लज्जाशील, लजाना
सज्जित कुमारी, शील दिखाना
पाँव के विपरीत हाथों से चलने की प्रथा
मुंह के आगे लटके परदे की व्यथा!
अन्धकार रश्मि, आवाहन
संस्कृति चिरंतन,पुनर्मंथन
कारक है अग्नि
कहीं तीव्र कहीं मंद
कहीं कैद कहीं स्वच्छंद
 
तमाम उम्र तमाम बार,
झेले हैं नग्न हो अत्याचार
अग्नि तीव्र है!

चीर छूट कर गिर गया
आंसूओं में बह गया,
आशा अभिलाषा का पूरा
एक प्याला उड़ेल दिया
अग्नि मंद है!!

ह्रदय पर है तीव्र दबाव
किस प्रकार ये रंग-ओ-आब
महमहाने से रुके
महमहाते ही मर्दित न हो जाए
बस
अग्नि कैद है|

आकुलता है अंतड़ियों में
छूट गयी है रोम से बूँद रक्त की
टूट गयी है गर्भगृह पूजा भक्त की
अग्नि स्वच्छंद है!

मांस की दो चार परत लपेटे,
मूक है शक्ति जिसकी--------
वह अस्थिमज्जा है|
लज्जा है

फड़क उठे लोचन
हुआ मृदुल गायन
ये क्षण हैं कुछ जिनमे
लज्जा का अवतार अपने अस्तित्व का प्रमाण ढूँढता है
मैं ढूंढ रहा हूँ लज्जा किसकी अवैध जनित
किस ब्याह का परिणाम,
क्यों नारी में है अधिक परिमाण
जिसकी ईंटों को स्पर्श कर कभी
सुखद अनुभूति दे जाती है
वह किस रस का छज्जा है
लज्जा है!!!

मैं
निराला- ताक कमसिन वारि
दिनकर-उर्वशी
प्रसाद-कामायनी
इनमे लज्जा के अंग अंश देखता हूँ

पहले कहे गए( पहले लिखे गए)
के अनुसार, 
लज्जा अवैध जनित
उत्पत्ति का आशय
यदि साहित्यिक है
तो किसका था ये आमाशय
जो पचा न सका इसे
और ये बिखर गयी,

मैं
स्वयं का पूर्ण वर्णन नहीं करता
लज्जा है
काम के द्वार पर आध्यात्म पानी नहीं भरता
लज्जा है
 वे स्वप्न मैं बतलाता नही,
लज्जा है
मूत्रदान संस्कृति का अंग कहलाता नहीं
लज्जा है
न जाने क्यों हवा इधर आती नहीं
लज्जा है
बे-इज्जत गली की कुतिया अब चिल्लाती नहीं
लज्जा है

वह खामोश है,
लज्जा है |
लज्जा बेहोश है
लज्जा है |
बुझता दीपक फिर से झिलमिलाता है,
लज्जा है
राकेश एक अमावस छिप भी जाता है
लज्जा है |
सूर्य का संधान सदैव रश्मियों पर नहीं,
लज्जा है |
लाली चमक रही पश्चिम में कहीं
लज्जा है |
लज्जा, छंद, अलंकार या रस,
या धुँआ-ए-सिगरेट का कश

जनवाणी,
विदूषक को लज्जा नहीं,
नगरवधू को लज्जा नहीं |
ये हैं वस्तु
क्योंकि वस्तु को लज्जा नहीं |

अंततः

मुझे लगता है|
तमाम कवियों की राय
लज्जा न जाने किस-किस-का है आभूषण
मैं भी यही कह दूं,
पुराना परिपेक्ष्य
नया क्षेत्र,
पावन-गेह पर जिसके,
इकट्ठे हो, बुद्धिजीवी/बेहया समाज की
विवेकशून्यता या,
चिता की जो साज सज्जा है
वह लज्जा है |
मैं  इस कविता को निराशा की गर्म राख फांकते हुए बयान कर रहा हूँ|
मैं नही चाहता था कि कोई कभी मेरी ये कविता पढ़े, किन्तु यह शायद मुमकिन नही|
मैं अंततः मौन रह जाता हूँ|

Thursday, 26 January 2012

बाकायदा तह कर के रखे गए तिरंगों के लिए लहराने का दिन है आज|
साल भर बक्से की सीलन के बाद ताज़ा हवा खाने के बहाने ये २-३ दिन बड़े अच्छे बनाये गए हैं|

एक स्कूली बच्चों का समूह लौट रहा था कहीं से कार्यक्रम करके, उनके मास्साब ने सब बच्चों  से तिरंगे इकट्ठे किये और सबको चाय नाश्ता कराया और अंत में जब उठे तो उन तिरंगो को वहाँ ऐसे रखा छोड़ दिया जैसे संसद में बैठने वाले लोग लोकतंत्र की आत्मा को संसद के प्रवेश द्वार पर छोड़ देते हैं|
खैर ये सब वाजिब है, होता रहता है, उपयोग के बाद वस्तुएं मूल्यरहित समझ ली जाती हैं वे कितनी ही अमूल्य क्यों ना हो|
लेकिन फिर जो हुआ उसने मेरी बेजान तिरंगे में आस्था को जां दे दी|
एक बच्चा आया उसकी उम्र देशभक्ति या तिरंगे का अर्थ भले ना समझे मगर उसने उन्हें बाकायदा समेट कर भली प्रकार तह कर के रख लिया|
जैसे ही मुड़ा मेरी साइकिल से टकरा गया बहाने से मैंने पूछा इनका क्या करोगे ?

उसने मुझे यों देखा जैसे इतना बड़ा बेवकूफ उसने जिंदगी में पहली बार देखा हो|
बोला करना क्या है इन सब का रेट दू से दस्स रुपैय्या तक है| आज शाम तक सब बिक जायेंगे|
बड़े सुकून से मैंने अपनी साइकिल पर उसका एक तिरंगा लगाया , पांच का एक सिक्का थमाया, और इस बात को महसूस किया कि तिरंगा फहराने वाले , नेता, तिरंगा फहराने का आदेश देने वाले संविधान और तमाम सारी बिखरी संवैधानिकता ने भले अपनी मौजूदगी में तमाम मुल्क को भूखा रखा है ,
मगर बेजान तिरंगा एक भूखे बच्चे को रोटी खिला सकता है|
वाकई जां इसी से है, इसी में है..............


Thursday, 12 January 2012

12th Jan 2012


१२ जनवरी , वैसे तो कोई खास नही ये उतना ही सामान्य दिन है जितना कि १ के बाद २ का आना ,
पर साथ इसके कि आज के दिन स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था....

आज दिन कुछ ज्यादा ही अच्छा बीता सुबह से ना जाने क्यों बड़ा उत्साह सा महसूस हो रहा था...
शाम तक इक संगोष्ठी या परिचर्चा कह लीजिए , जिसमे भाग लेने का मौका मिला.
परिचर्चा विवेकानंद के ऊपर ही थी, जैसा कि सब जानते है कि वो १०-१२ जन आगे बैठकर और ४०-५० लोग सामने बैठकर ऐसा कार्यक्रम मानते हैं,. सब आकर प्रशंसा में दो चार शब्द कहते हैं , कुछ लोग भारत की अब तक की तरक्की का जिम्मेदार तक बता देते हैं, उसे, जिसका कि उस दिन जन्मदिन होता है,
यही सब तो आज भी हुआ लेकिन अब लोग थोडा अलग दिखना चाहते हैं,एक बुद्धिजीवी इसी दृष्टि से आये थे, उन्होंने ऐसे कार्यक्रम को निरा बकवास बताया, बोले,
विवेकानंद ने कुछ खास तो नही किया हम सब इक आदमी के नाम का ढोल पीटकर बैठ गए हैं| उसे आता ही क्या था, उस टाइम कोई अक्लमंद पैदा ही नही हुआ जो उसकी बातों को काट सकता|
इन बुद्धिजीवी महोदय ने विवेकानंद का भयानक चरित्र-चित्रण इस प्रकार से किया मानो, कार्ल मार्क्स आज भी भौतिकतावाद पर उनका अवैतनिक सलाहकार हो|
आगे भी कहा कि विवेकानंद को खुद कुछ आता जाता ही कहाँ था कि वे तो रामकृष्ण की बोई फसल काट रहें थे|!!!!!!!!!!!!!!!!!

वाकई इतने महान, प्रयोगवादी और निर्भीक बुद्धिजीवी अब हर गली में पैदा होने लगे हैं, प्रो.नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, अरुंधति राय....... इन सब से प्रेरित होकर ये नयी प्रजाति विकसित – फलफूल रही है|(परिभाषा:बुद्धिजीवी=परम असहमति) ये एक ऐसा रोग है जो किसी भी बात पर ठीक उल्टा कहने करने या कम से कम बताने को प्रेरित करता है|
मेरे आस पास कम से कम ३ तो ऐसे लोग हैं ही, उनकी चर्चा फिर कभी.....
आज केवल विवेकानंद पर बात करूँगा..
विवेकानंद से परेशान लोगो आपकी आत्मा को शांति मिले(सर्वप्रथम),
अब , बरसों पहले एक ऐसा शख्स उभर कर आया था जिसने विश्व मंच पर उपस्थित तमाम बुद्धिजीवियों , धर्माधिकारियों, आस्तिकों नास्तिकों की बेवजह की बहस को शांत कर दिया था, इस शख्स की विशेषता कहें या पराक्रम कि जब इन्हें वाणी मिली तो दूसरे खुद की जीभ काट बैठे|
आज जिन बुद्धिजीवियों को उनसे तमाम असहमति है, मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि विवेकानंद के साक्षात्कार के ५मिनट के भीतर वे लघुशंका का बहाना ढूँढ लेंगे| एक आदमी इतना समर्थ तो था कि उसकी बात को तुम्हारे जैसे ५००० बुद्धिजीवी भी उसके सामने कभी नही काट पाए और उसका सामने बोलने की हिम्मत नही रख पाए, और आज आप खुद को देख लीजिए, चार कुत्ते भी मुफ्त में आपकी बात नही सुनेंगे बीच में ही कुतिया की बात शुरू हो जायेगी....
ना जाने क्यों हम सस्ती लोकप्रियता के पीछे भागते हैं|
अरे कब समझोगे मित्र कि किसी सही व्यक्ति की आलोचना से तुम चर्चा में आ सकते हो, लेकिन तुम्हारे विचार सदैव तुम्हारे खुद के प्रति ही विश्वासघाती रहेंगे| 

काश कि हम मौलिकता के साथ जिंदगी के नए तराने ढूँढ़ते रहें, ना कि किसी और की रौशनी में खुद को जलाकर खाक हो जाएँ|

इक आखिरी बात और, क्रांति ,समता , जनवाद, प्रयोगवाद , नया दृष्टिकोण ना जाने क्यों कि अब इन शब्दों से मुझे व्यक्तिगत रूप से बदहजमी हो गयी है....

 विवेकानंद जयंती पर तमाम जनों को, जो ज्ञानयोग राजयोग प्रेमयोग इत्यादि से स्वयम को सिंचित कर प्रसन्न हुये हों, हार्दिक शुभकामनाएं....

Friday, 23 December 2011

थक गया है सूरज

सूरज थक गया है....
इसे,
डूब जाने दो...

आँख नम् है,
भींग जाने दो...

शाम प्यासी है...
ढल जाने दो,

थोड़ी उदासी है,
बिखर जाने दो,...

तारों का रंज ठहरा,
झिलमिलाने दो...

दबे गुलाब मचल गए....
महमहाने दो...

खिड़कियाँ मौन हैं,
कुछ
हवा आने दो....

बेरंगी आसमान पर,
नए,
रंग,
छाने दो...

सवाल हो चुके हैं,
जवाब आने दो,

पूरी किताब हुयी,
हिसाब आने दो,...

उधड़ गया एकतारे का,
एकलौता तार भी,

धूल इस पार की,
पहुंची उस पार भी,

साँसे दो चार भी
ना मिल सकी उधर की,

आगे की बात हम ना
 कह सके प्यार की....

अनत रूप अधिकार, ह्रदय अक्ष पर सर्प सा,
प्रेम पीर आधार, सौ प्रपंच की जद भले,

व्यापक व्याकुल प्रेम, जिनके हृद वे अति विकल,
किन्तु रसिक का नेम, दिय बाती सो जोड़ इहि...........

Thursday, 15 December 2011

Drops and Rasa

Drops are the small duties, desires and expectations. We think that as possible as a person , as a student, as a part of society, as a civilian, we should have to perform these not important but initial duties.
These may give the spectator an outline of you, and not only you but other subgroups, you belong, like your society, your region, your country. But really, in this bread butter life we don't have time to consider about these drops...
Now RASA, a Hindi word, and really I can't define it but all the happiness, joy or problems even deep sadness are inside it, yet it's RASA.
Its the power and shower of life. Power as it force to live when you are in the war of survival,
and Shower, when you are sharing your appearance with nature or the the natural creatures....

So sad, we have also no time for RASA, in deed our life battles are based on the piece of bread, cup of tea, money in wallet, marks on board, friends on facebook.....
So how can we expect that we'll see the wounds of other, the problems of society, the image of nation......
May the day will come, when we'll free from our ego, our desire to proof the existence, and just to build the so-called 'level'.

With warm love in such a cold winter night

Sunday, 27 November 2011





मिलने  का ना मिलने से गजब का नाता है......
अगर मिल सको तो मिलना नही चाहोगे, और जो ना मिल सको तो मिलने की तडप हमेशा झुलसाती है....
इश्क है भी इतना आसां समंदर नही कि वो हो ही जाये जो तुम् चाहो...
तमाम उम्र चौराहे पर चांदनी निहारते लैम्प पोस्ट के नीचे भी बीत सकती है या बर्फ की ठेली के पास उसके साथ गोला खाते हुए भी...........
लेकिन इतना तो तय है कि जो तुम्हारा जमीर तक तुम से ना करा पाए, जिसे करने में तुम्हारी आत्मा भी बेवफाई दे जाए,,,,,,,,,,,,,,,,,, 
इश्क वो सब तुमसे करा देता है ...........................
सो इश्क जमीर से ऊपर है वजूद से ऊपर है........
इश्क इसीलिए परमात्म है ईश्वर है खुदा है......

कभी जो हम मिल पाते सुनहरी  शामों को याद करते,
आँगन की टूटी हुई खाट पर ही सही,
पुरानी बात  पर ही सही,
कुछ वक्त  बर्बाद तो करते,
ऋतु का बर्ताव भले ही मोहक ना होता ना सही,
कुछ बूंद  से ही सही, बारिश का एहसास तो करते,
नरम हाथो की तपिश भुला ना पाती गम सारे ना सही,
कुछ आंसुओं से मौसम आबाद तो करते,
जिंदगी इतनी कमजोर होगी सोचा ना था,
वरना यूँ अकेला छूट जाने की बात न करते.............

Wednesday, 23 November 2011

मेरा हर सवेरा नयी जिंदगी है,
क्योंकि ना चाहते हुए भी ये बात बिलकुल सही है,
कि हर सुबह से मैं अपनी नयी जिंदगी शुरू करता हूँ और पूरे दिन में उसे जीने की कोशिश....
जब लगता है कि आज जीत चुका हूँ तो रात हो जाती है.......
और जब लाख जतन कर हार जाता हूँ तो अगली सुबह का इंतजार बढ़ जाता है.....
मायने जीत या हार के हैं भी और नही भी..
फिर भी हर रोज जिंदगी को साँसों की हरकत भर से कुछ ज्यादा समझ लेना ये निशानी है कि इन रंगों से अठखेलियाँ करना ना सिर्फ मुझे सुकून देगा बल्कि खुद ये रंग जिस रंगोली में बिछेंगे जिस आँगन उतरेंगे, नए और ताज़ा तराने वहाँ कुछ जरूर छूट जायेंगे.........
तमाम उम्र तमामों की बीत भले रही होगी क्या वाकई? मेरी फ़िक्र में?
कहीं मैं यूँ तो नही! वैसा या ऐसा कैसा हूँ?
पर मुझे ये चिंता कब होती है ये याद नही.......

Sunday, 20 November 2011

है बात पुरानी खास नही,,,,, है कब की ये भी याद नही..................................


अँधेरी रात से उजियाली बात कहो,
राख बची रह गयी सड़क पर फुलझड़ी की,
उस राख की बेरुखी पर कोई सवाल नही,
मगर किसी के अंधे भविष्य पर अब भी मौन ना रहो,
रात भर उडती रहेगी शराब उसके बाप की,
जिसने गँवा दिया अपने हाथ की अँगुलियों का-
अगला हिस्सा,
किसी पटाखे का पेट बनाने में,
कुछ और नही,
उस अबोध का दर्द नही,
बस कभी आइसक्रीम ना पकड़ सकेंगी,
जो अंगुलियां,
उनकी मज़बूरी बेआस सहो,
कुछ कहीं घी दिया जलता तो बात बनती,
वो लौट आता इसी बहाने से वनिता सजती,
मगर है कहीं गरीबों का पोकर अड्डा,
जहाँ से लौटना तो है,
मगर तमाम कुछ गंवाकर,
सो घी तो नही मगर जल रहा है तेल का दिया,
मद्धिम रौशनी है जिंदगी की,
काला पड़ गया अलमारी का किनारा,
बुझते दीपक से उज्ज्वल नहीं,
जलते भविष्य की ना बाट जहो,
इस दीवाली इतने ही उजियाले की बात करो.....................