Friday, 26 May 2017

मेरी बेटी !

आखिरी पोस्ट एक कविता !
मेरी बच्ची,
जब भी पैदा हो,
या मैं उसे गोद ले सकूँ, 
मैं उसे व्यावहारिक बनाऊंगा,
ताकि लोगों की नज़र में वह....
मतलब कि,
लोगों की नज़र में वह आ ही न सके !
बेटी, तुम लिपस्टिक, पाउडर या पैरों के बाल हटवा कर,
या आधी बाहों से कम, या कि नाभि से उपर
या खुली टांग वाले, या पीछे गले को दिखाते हुए
कपडे मत पहनना !
मुमकिन है कि मैं एक दो टाट के बोरे,
या पूरा सूती कफ़न खरीद कर रख दूंगा !
तुम्हे पहनने को कमी न होगी,
और मुझे इज्जत की कमी न लगेगी !
बेटी, तुम तेज आवाज में न बोलना,
'मैं आपकी बहन जैसी हूँ,'
'माँ जैसी हूँ,'
'बेटी जैसी हूँ,'
इन वाक्यों का अभ्यास करना !
शीशे के सामने, धीमी आवाज में !
लाचारी ना भी हो तो पैदा कर लेना !
क्या फर्क पड़ता है ?
बाकी सारा ज्ञान बकवास है,
बस यही आखिरी ज्ञान है !
बेटी, ये आखिरी ज्ञान,
प्रेम मत करना, और
अपनी सफाई के रुमाल को,
पेपर से ढँक कर,
बक्से में छिपा देना !
घर में आये रिश्तेदार भी कई बार,
अपनी अज्ञानता से तुम्हे अश्लील समझ लेंगे !
और फिर जब तुम्हारा बलात्कार होगा,
तो तुम्हे निर्लज्ज कहा जायेगा !
किसी लड़के के साथ घूमना-
नहीं, नहीं, कभी नहीं !
प्रेम - तो बिलकुल नहीं !
प्रेम बलात्कार से भी बुरा होता है बेटी,
प्रेम में आत्ममिलन का खतरा होता है,
जीवन के सर्वोत्तम सुख को जीने का अवसर होता है,
यदि ये तुम्हे मिल गया तो.....
दुनिया का क्रम टूट जायेगा,
धरती चलनी बंद हो जाएगी !
तो भोग्या बन के रहना,
उचित समय पर,
साथी, दोस्त, रिश्तेदार या पति,
तुम्हारा भोग कर सकें !
क्योंकि बेटी,
तू आदमी और जानवर के बीच झूलती चिड़िया है,
या तो पिंजरे में, या तश्तरी में !
मैं नहीं चाहता तुम्हे कोई परोस दे !
और मुझे पछताना पड़े कि,
गोद या जन्म,
मैंने किसी लड़के को क्यों नहीं दिया !
सो बेटी,
अपने बाप पर दया .....
दया कौन करेगा ?
तुझे इस दुनिया में आना है या अनाथालय से मेरे घर -
तो ये सब मानना पड़ेगा !
समझी कि नहीं ?
तेरा दिमाग ख़राब न हो कभी !
बेवकूफ है अपनी माँ की तरह

Saturday, 8 October 2016

पुनर्जन्म

दहाड़कर मरने कौन जाता है,
जिस अनुभव का मूक रहना जरूरी,
शोर कम होना चाहिए जब आप
जलने के आखिरी पड़ाव पर हों,
जिंदगी के इंतज़ार को,
मौत पर ख़त्म होना होता है !

पर कभी कभी,
ऐसा नहीं होता,
कोशिश होती है, समझो जैसे रस्साकशी,
एक दीमक और लकड़ी के बीच जैसी,
जब पाउडर हो चुकी सतह के अंदर,
मौजूद होती है कोई गाँठ,
जो न कटती है, न निकलती है !
कभी कभी लकड़ी की भी विजय होती है !

कोशिश होती है, समझो जैसे पिघलाने की,
एक लकड़ी का बना जत्था,
पिघला देता है लोहे को भी,
कभी कभी, 1000 चोटों के बाद
1001वां प्रहार, चूर चूर कर देता है,
शक्ति, अभिमान, और निराशा,
निराशा, !
कब चूर होती है?
जब पसीने की एक बूंद,
बींध देती है बंज़र ज़मीं को,
और भिंगो देती है ईश्वर का आँचल !

कोशिश होती है समझो जलने की,
एक दीपक, जिसे बुझने की कोशिशें जारी हों,
हवा, बाती सब खिलाफ हो जाते हैं,
यकीन मानिए, आप मैं नहीं,
कभी कभी एक दिए का भी साँस लेना मुश्किल होता है !
वातावरण उसका भी दम घोंटता है,
और जिंदगी मौत हो जाता है,
जलने बुझने का द्वंद्व !
पर कभी कभी,
कपास का एक कतरा उलझ जाता है,
आंधी तूफान से !
दिए का कमजोर हिस्सा शक्तिशाली हो जाता है !
वो कतरा
जिसे शायद मंजूर न रहा होगा,
किसी सूत का हिस्सा बनना,
उसका अल्हड़पन, मशीन या कि करघे को भाया नहीं होगा,
वह कतरा ही टिक जाता है,
खूंटा गाढ़ कर जलता है,
और बुझता नहीं !

कोशिश होती है समझो उगने की,
जब सीमेंट कंक्रीट में मेरे जीने की जगह,
वजह
छीन ली जाती है,
और मैं हाथ बांधे , बांस बल्लियों का बंधना,
ईमारत का बनना,
और खुद का बिखरना देखता हूँ,
लोग रहना शुरू कर देंगे मेरे छलनी सीने पर
जल्दी ही !

पर कभी कभी ,
मेरे अंदर अंकुरण होता है,
आत्मनकुरण
जो फोड़ देता है रोम रोम,
और बाहर निकलता है तोड़ते हुए,
कंक्रीट को भी,
ये अंकुरण मैदान में, मिटटी में नहीं होता ,
ये तभी होता है
जब मुझे दबा दिया जाता है,
जब मैं बुझने वाला होता हूँ,
जब मैं मिटने वाला होता हूँ,
जब मैं गिरने वाला होता हूँ,

जिंदगी और मौत के इसी संकरे फासले के बीच
मेरा पुनर्जन्म होता है !

Thursday, 5 May 2016

नक्शा, नक्शेबाज़ी और लकीरों का खेल

जम्मू-कश्मीर की बारीक रेखाएं : सही कौन 



तो खबर है कि यूँ ही मुल्क के नक़्शे को आप गलत नहीं दिखा सकते, कुछ करोड़ का जुरमाना, सात साल की सजा का एक प्रावधान सुनिश्चित किया गया है ! यद्यपि तब, जब कि मैं ये लिख रहा हूँ शायद मेरा लिखा इस बात के दायरे में आ जाये, सो जो लिखा है बड़ी सावधानीपूर्वक लिखा है

आप जब ये अधिसूचित करते हैं कि भारत का नक्शा गलत दिखाने पर सजा होगी तो कुछ चीजें, अपिरिभाषित और अस्पष्ट रह जाती हैं | मसलन, सजा कैसे होगी ? गलत नक्शा भूल से दिखाने पर भी ? अब जैसे कि ऊपर एक चित्र है जिसमे मैंने दो नक़्शे दर्शाए हैं, पहला गूगल के ब्रिटिश संस्करण का और दूसरा भारतीय संस्करण का | मुद्दे की बात यह है कि सेंट्रल कराकोरम नेशनल पार्क जैसी जगह जो कि वैश्विक स्तर पर पाकिस्तानी बताई जाती है, को हमने अपने सर्वे ऑफ़ इंडिया में जगह नहीं दी है अपितु समूचे कश्मीर के नक़्शे को ही प्रतिबंधित बताया है | विदेश नीति का कोई तो ऐसा हिस्सा है जिसकी मुझे समझ नहीं, क्योंकि हमारा विदेश मंत्रालय भारत के नक्शे को वैसा ही दिखाता है जैसा कि गूगल, अर्थात, आजाद कश्मीर (?) (पश्चिम में), नेशनल कराकोरम पार्क (ऊपर का हिस्सा) और अक्साई चिन (पूर्व का हिस्सा), ये सारे विवादित होकर भी भारत के हिस्से माने गये हैं |

अंग्रेजो से एक चीज हमने बहुत अच्छी सीखी, विवादों को लम्बे समय तक जारी रखने की | क्या है न कि हम भारतीय इतने प्रतिभावान हैं कि बहुत सारा काम भी कम समय में कर लेते हैं, तो बाकी समय लड़ाई, बहस, मुद्दे में बर्बाद होना ही चाहिए , चाहे वह अयोध्या में मस्जिद-मंदिर का मुद्दा हो, दिल्ली का आधे-पूरे राज्य का, और तमाम नदियों में पानी के बंटवारे का | असल में जो भी हमे मिला, शायद थोडा जल्दी मिल गया | कुछ एक शताब्दी की गुलामी और होती तो इस जमीन का मोल समझा देती जो कि आज हम समझते नहीं | खैर मुद्दे की बात, तो, जो हमने सीखा अंग्रेजों से वो ये, कि मुद्दा कैसा भी हो जिन्दा रहना चाहिए, वजह यही थी शायद कि एक बार 1965 में हम काफी सारे कश्मीर को हद में ले चुके थे, पर दानवीर जो ठहरे, दान करके चले आये | और माशाल्लाह, तब से सरकारें भी सिर्फ दिल्ली की सर्दी गर्मी झेलती रहीं, कश्मीर और कन्याकुमारी का क्या हाल था किसी ने जाना तक नहीं | कारगिल युद्ध (जिसमे हमने ब्रिटिश नक़्शे में दिखाए गये, अपने खुद के हिस्से को ही वापस लिया, आज़ाद कश्मीर या गिलगित या अक्साई चिन को नहीं) के बाद अचानक इन एक दो सालों में जब कश्मीर मांगे आज़ादी की बहस शुरू हुई, और अचानक सरकार को लगा कि देश पूरा दिखने के लिए कुछ प्रावधान, कुछ कानून या कुछ आदेश दे दिए जाएँ |

दे दीजिये हुज़ूर जरूर दे दीजिये, जनता द्वारा चुनी गयी सरकार का हुक्म सर आँखों पर | पर हाँ कभी जो आपके दिल में कुछ और आये तो, इतना जरूर कीजियेगा कि कश्मीर और अरुणाचल की अवाम को महफूज़ होने का और अपनेपन का एहसास करा दीजियेगा, क्या पता है, जितना आज है (अपने नहीं, दूसरो के नक़्शे में ही सही, अपने में तो दूसरो से दोगुना कश्मीर है) हम उतने को ही बचा के रख पायें | बाकी गिलगित और अक्साई चिन के लिए पडोसी की गलती और संयुक्त राष्ट्र संघ को समझाने का इन्तजार करिए, क्यूँ कि या तो आपने सामने की लड़ाई (और उसमे भी जीत कर फिर से वापस ना कर आयें तो) या वैश्विक समुदाय को विश्वस्त करने पर ही उतना कश्मीर और अरुणाचल आपका हो सकेगा जितना विदेश मंत्रालय के अनुसार है, या कि जितने प्रकाशन के लिए आपने सजा का प्रावधान किया है |

आपकी जमीन के बंदरबांट से सैकड़ों मील आगे निकला हुआ, भारत का नागरिक !

Thursday, 9 July 2015

कल अलग होना है...............

और जब आखिरी रात आती है,
कल अलग होना है ये बात
सोने नहीं देती

न तो अलग होता है आखिरी पन्ना
डायरी का जिसमे लिखी कवितायेँ तुम्हारे लिए
मैं वो आखिरी पन्ना फाड़ना चाहता हूँ
बस पता नहीं कैसे हाथ सुन्न हो जाता है
यकायक बूँदें धुंधली कर देती हैं स्याही
आँखों से फिसल कर लिख देती हैं
हमारे और तुम्हारे बीच की कोई बात
जो कोई और देख भी ना सके।
पाना तो कुछ है नहीं
कमबख्त खोने भी नहीं देती...
तुम्हारे बिन ये आखिरी रात
सोने नहीं देती....

और जब बंद करना चाहता हूँ किताब के वे पन्ने
जिनके कोर तुम्हारी अँगुलियों को छूकर मुड़ गये थे,
पता नही क्या हो जाता है मेरी अँगुलियों को
पन्ने पलट तो जाते हैं
ख्वाब उलट तो जाते हैं
जाने कौन सी बेहया हवा
किताब बंद होने नहीं देती
कल अलग होना है ये बात
सोने नहीं देती।

और जब मैं निकलने को होता हूँ
पसीने पसीने लथपथ सा
पोंछता हूँ बार बार अपना माथा
ना तो गर्मी कम होती है
न आँखों का पसीना
न सर की जलन
सारी नमी
और पोंछने की हर कोशिश
वो काला निशान
शायद तुम्हारे काजल का
मिटने नहीं देती....
कल अलग होना है ये बात
सोने नहीं देती..........

Tuesday, 7 July 2015

नहीं यहीं कहीं.......................

हमको तेरा सहारा, नहीं तो नहीं,
तू अलग है किनारा, नहीं तो नहीं,

हमने रक्खे अँधेरे में दिल के दिए,

तूने जब भी पुकारा, यहीं तो यहीं,

एक घर, एक ख़ाब, एक मंजिल थी बस,

तूने सब कुछ उजाडा, यहीं तो यहीं,

आँख से दिल तलक सारे रस्ते खुले,

आंसुओं को पसारा, कहीं तो कहीं,

अब ना कोई धरम है मेरा जिंदगी,

ज़ुल्म करना करारा, नहीं तो नहीं....

Tuesday, 10 February 2015

क्यूटियापा सप्ताह विशेषांक -



क्यूटियापा सप्ताह और मेरा जन्मदिन हर साल कुछ न कुछ नयी बातें जोड़ जाता है ;-)

आज रोज डे और प्रपोजल डे कंबाइन

बरस भर पहले लगभग, एक गुलाब लेकर एच ओ डी ऑफिस के बाहर खड़ा अपने वाइवा की बारी का इंतजार और तुम्हे अकेला पाने की कोशिश कर रहा था..... अचानक तुम दिखी किसी क्लासरूम के बाहर टहलती शायद जिसकी डेस्क पर तुम्हारे टिफ़िन की चीजें मेरे हाथ से फिसल कर उसे गन्दा कर देती थीं (तुम जानती हो मुझे ढंग से खाना तक नहीं आता.....)
और बस..... दस मिनट बाद मेरा नंबर था लेकिन उससे पहले मेरा हाथ गुलाब का एक फूल तुम्हारी ओर बढ़ा चुका था..

और तुम... भोलेपन से बोल कर चली गयी "आय कैन एक्सेप्ट रोज बट नॉट यू......"

मुझे आज भी याद नहीं आया कि उसके बाद मेरे दिमाग को क्या हुआ... बस इतना याद है कि पांच मिनट बाद वाइवा शुरू हुआ और फिजिकल केमिस्ट्री की सारी अंडरस्टैंडिंग तुम्हारे होठो से निकले धारदार लफ़्ज़ों से कट कर टुकड़े टुकड़े हो चुकी थी और मैं लगभग बेसहारा सा कमिटी रूम से बाहर आ गया......

उसके बाद केवल इतना और याद है कि हॉस्टल के रूम की पूरी सफाई करने के बाद मैं तुम्हारी तमाम  तस्वीरों को बिखेरे बैठा था लेकिन ये नहीं समझ आ रहा था कि किस तस्वीर में

Friday, 9 January 2015

बड़े दिनों बाद --------



एक तेरे दर का सहारा और घर जाना नहीं,
तू अगर ठुकरा गया गया तो फिर संभल पाना नहीं,
********************************************
आँख, आंसू, नींद, सपने सब तेरे पैरों तले,
तू अगर अपना नहीं, तो कोई अपनाना नहीं,
****************************************
ठोंककर ख़म जिंदगी को दे चुनौती चल रहे,
आ तुझे मैं जी रहा हूँ, तू रहम खाना नहीं,
****************************************
तूने अपने हुक्म से करवा लिए सब फैसले,
मेरे हिस्से में हुनर-ए-जिरह का ताना नहीं,
*****************************************
बेहिसाबी से जिया है और किया है अब तलक,
तू न गर समझे तो अब फिर और समझाना नहीं,
*****************************************
नाप ले गर शक शुब्हा हो कूव्वत-ए-निबहा मेरी,
ये मेरी खामी है इसका कोई पैमाना नहीं,
*****************************************
ना मुझे दे ख्व़ाब वे जिनमे मुनासिब 'मैं' से 'हम',
तू मेरा सब कुछ मगर तेरा मैं इक आना नहीं......

Monday, 1 September 2014

इसक

इसक ...
तन वाला
मन वाला
वो तो सबका होता है,
तुमसे जो मिला
वो पथरीला इसक
जहाँ तुम बैठ कर
एक दो मिनट
मेरे साथ चली गयी.
मैंने उस पत्थर को
छू कर पा लिया तुम्हे,
अपना पथरीला इसक

औरों के लिए जीना और मरना इसक,
पर तुमसे जो मेरा,
वो सांस लेना इसक,
ठहरना इसक , फिर से चलना इसक
अपना महकता इसक.

लेने और देने वाला ,
वो तो सबका होता है,
तुमसे जो मेरा,
वो खोना इसक
फिर से पाना इसक,
तेरे बिन है हर तराना इसक.

सबका जो होता है भरोसा इसक,
इसक कोई शर्त, इसक कोई बंदिश,
पर तुमसे जो मेरा,
हर इजाजत इसक, हर इबादत इसक,
अपनी आदत इसक......

Saturday, 5 July 2014

मैं तुम्हारे पास आ गया हूँ.....

फिर जो महकने लगें अंगना तुम्हारे फूल, 
फिर जो अंगडाई ले उठें तुम्हारे बिस्तरों की सलवटें, 
फिर जो पर्दों को बेशरमी से उड़ाने लगे हवा, 
फिर जो मिलने लगे तुम्हारी तन्हाई को दवा, 
फिर जो खनकने लगें तुम्हारे कंगन बिना जाने, 
फिर जो लब सूखने लगें तेरा कहा माने, 
फिर जो बारिश सी महसूस हो पलकों में, 
फिर जो तपन सी महसूस हो गालों पर... 
फिर से पांवों पर महसूस हों थपकियाँ, 
फिर से जो दर्द की दवा बनें हिचकियाँ, 
फिर से जो भींगने को दिल प्यासा हो आये, 
फिर से जो सीने में कोई धड़कन सुना जाए... 
फिर से तुम्हारे गेसुओं में फंस जाएँ कोई अंगुलियाँ, 
फिर से तुम्हारी हथेली को मिलें प्यार भरी नर्मियां... 
समझ लेना बादल सा आवारा छा गया हूँ, 
मैं फिर से तुम्हारे पास आ गया हूँ....

Friday, 9 May 2014

मेरे जैसे !!!



बेसहारा लोग,

मेरे जैसे,

ढूंढते फिरते हैं,

एक कन्धा,

या एक हथेली,

इसलिए,

कि रिश्ते अधूरे न रहें,

कम न पड़ें,

कि जीने की कोई वजह ना मिले,

मेरे जैसे,

ढूंढते फिरते हैं,

एक साथ,

एक राह,

कि कोई चलने को राजी भर हो,

बाकी, उसके कदम हम खुद हो जायेंगे,

मेरे जैसे,

ढूढ़ते फिरते हैं,

एक दिया,

बिना तेल ही,

राजी हो जलने को,

हवा के हर झोंके में,

तेल हम खुद हो जायेंगे,

मेरे जैसे,

ढूंढते हैं,

एक नाव छोटी सी,

जो राजी हो खेलने को,

किसी शाम लहरों पर,

नदी हम खुद हो जायेंगे,

मेरे जैसे,

ढूंढते हैं,

खिड़कियाँ,

जो ऊंचाई पर हों इतनी कि,

ठंडी हवा आ जाये,

सहला जाए,

कोई और ना देखे,

परदे हम खुद हो जायेंगे,

मेरे जैसे,

ढूंढते हैं,

काजल,

तुम्हारी आँखों में,

बस बस कोर के ठीक नीचे,

हाँ हाँ थोडा सा फैला हुआ,

बाहरी किनारों पर,

खतरे पर, आंसू पर,

पोंछ हम खुद जायेंगे,

मेरे जैसे,

तुम्हारी जिन्दगी की रफ कॉपी के पन्ने,

तुम लिखो, अच्छा लिखो,

सुन्दर नए कागजों पर,

अपनी इबारतें,

कूड़े में हम खुद जायेंगे,

मेरे जैसे,

होते है तीन लकड़ियाँ नहीं,

चार कंधे नहीं,

दो डलिया मिटटी नहीं,

गिरजे की मोमबत्ती नहीं,

पर वो सब जो तुम्हे सुकून दे सके,

अपने आखिरी करम तक,

तुम्हारे आखिरी रहम तक,

ऑक्सीजन की तरह,

बस जरूरत बनी रहे,

मयखाने की तरह,

बस प्यास बनी रहे,

हम तुम्हारी जरूरत और प्यास,

बनकर इतरा तो सकते हैं,

एक रोज,

छलक हम खुद जायेंगे,

बिखर हम खुद जायेंगे,

मेरे जैसे....